बात बहुत पुरानी है. तब मै B.Sc.फाइनल इयर मे था. मेरी माता जी की तबियत उस समय कुछ खराब चल रही थी. डाक्टर से तारीख मिल गई थी, इसीलिए मुझे तत्काल मम्मी को लेकर लखनऊ जाना था. ये जनवरी की कडकडाती ठंड का मौसम था, और उस दिन कुछ ठंड भी ज्यादा थी. हमे रात वाली पैसेंजर ट्रेन से लखनऊ जाना था. अधिकांश ट्रेन खाली थी. हम लोग दरबाजे के पास वाली सीट पर बैठ गये. हमारे आस पास 4-5 लोग और बैठे हुए थे. ठंड की बजह से सभी ने सर तक साल ओढ रखी थी. मेरे सामने वाली सीट पर एक बिहारी ठंड से कंपकपाता हुआ बैठा था. रास्ते में संड़ीला स्टेशन पर ट्रेन काफी देर रूकी. मेरे सामने बैठा बिहारी वहाँ उतर गया. जब ट्रेन चलने लगी तभी मेरे पास बैठे व्यक्ति ने दरबाजा अन्दर से बन्द कर लिया, ताकि ठंडी हवा अन्दर न आ सके.
कुछ समय बाद मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने बाहर से दरबाजा खटखटाया. मैने पास वाले व्यक्ति से कहा कि शायद किसी ने दरबाजा खटखटाया. उसने कहा, ट्रेन काफी तेज चल रही है, इसीलि हवा से दरबाजा खटक रहा है. मैं शांत बैठ गया की शायद यही कारण होगा। मुझे 2-3 बार और दरबाजा खटकने की आवाज आई पर मैं शांत बैठा रहा. कुछ देर बाद वो खटखटाने की आवाज भी आनी बन्द हो गई. पर पता नही क्यों मेरा मन नही मान रहा था. लगातार ये लग रहा था कि शायद कोई तो था। आख़िरकार मन नहीं माना और मैंने उठकर दरबाजा खोल दिया. सामने का दृश्य देखकर मेरी आँखें खुली की खुली रह गयीं. मैंने देखा कि सामने वही बिहारी व्यक्ति अकडा हुआ व गिरने की कगार पर खडा था. मैने जैसे तैसे उसे अन्दर खींचा और वह धडाम से अन्दर गिर पड़ा. काफी देर बाद जब उसमे जान आई तो उसने मेरे पैर पकडकर कहा कि अगर 5 मिनट और आप नही आते तो मेरे हाथ छूट जाते.
अगले स्टेशन पर मैने उसे चाय पिलाई और पूँछा कि तुम उतरे क्यों थे ? वह बोला, "मुझे ट्रेन मे पेशाब नही आती, इसलिए नीचे उतर गया था". उसकी बात सुनकर वहाँ बैठे सभी लोग हँस पड़े. आज पता नही वह कहाँ होगा, पर ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह जहाँ भी रहे पर दोबारा ऐसी गलती न करे.
कुछ समय बाद मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने बाहर से दरबाजा खटखटाया. मैने पास वाले व्यक्ति से कहा कि शायद किसी ने दरबाजा खटखटाया. उसने कहा, ट्रेन काफी तेज चल रही है, इसीलि हवा से दरबाजा खटक रहा है. मैं शांत बैठ गया की शायद यही कारण होगा। मुझे 2-3 बार और दरबाजा खटकने की आवाज आई पर मैं शांत बैठा रहा. कुछ देर बाद वो खटखटाने की आवाज भी आनी बन्द हो गई. पर पता नही क्यों मेरा मन नही मान रहा था. लगातार ये लग रहा था कि शायद कोई तो था। आख़िरकार मन नहीं माना और मैंने उठकर दरबाजा खोल दिया. सामने का दृश्य देखकर मेरी आँखें खुली की खुली रह गयीं. मैंने देखा कि सामने वही बिहारी व्यक्ति अकडा हुआ व गिरने की कगार पर खडा था. मैने जैसे तैसे उसे अन्दर खींचा और वह धडाम से अन्दर गिर पड़ा. काफी देर बाद जब उसमे जान आई तो उसने मेरे पैर पकडकर कहा कि अगर 5 मिनट और आप नही आते तो मेरे हाथ छूट जाते.
अगले स्टेशन पर मैने उसे चाय पिलाई और पूँछा कि तुम उतरे क्यों थे ? वह बोला, "मुझे ट्रेन मे पेशाब नही आती, इसलिए नीचे उतर गया था". उसकी बात सुनकर वहाँ बैठे सभी लोग हँस पड़े. आज पता नही वह कहाँ होगा, पर ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह जहाँ भी रहे पर दोबारा ऐसी गलती न करे.

Bahut sundar story!
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