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Thursday, 8 August 2013

नमस्कार के लाभ...


'नम:' धातु से बना है 'नमस्कार'। नम: का अर्थ है नमन करना या झुकना। नमस्कार का मतलब पैर छूना नहीं होता। नमस्कार शब्द हिन्दी, गुजराती, मराठी, तमिल, बंगाली आदि वर्तमान में प्रचलित भाषाओं का शब्द नहीं है। यह हिन्दू धर्म की भाषा संस्कृत का शब्द है। संस्कृत से ही सभी भाषाओं का जन्म हुआ।
हिन्दू और भारतीय संस्कृति के अनुसार मंदिर में दर्शन करते समय या किसी सम्माननीय व्यक्ति से मिलने पर हमारे हाथ स्वत: ही नमस्कार मुद्रा में जुड़ जाते हैं। नमस्कार करते समय व्यक्ति क्या करें और क्या न करें इसके भी शास्त्रों में नियम हैं। नियम से ही समाज चलता है।

नमस्कार के मुख्यत: तीन प्रकार हैं:- सामान्य नमस्कार, पद नमस्कार और साष्टांग नमस्कार।

सामान्य नमस्कार : किसी से मिलते वक्त सामान्य तौर पर दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर नमस्कार किया जाता है। प्रतिदिन हमसे कोई न कोई मिलता ही है, जो हमें नमस्कार करता है या हम उसे नमस्कार करते हैं।

पद नमस्कार : इस नमस्कार के अंतर्गत हम अपने परिवार और कुटुम्ब के बुजुर्गों, माता-पिता आदि के पैर छूकर नमस्कार करते हैं। परिवार के अलावा हम अपने गुरु और आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न व्यक्ति के पैर छूते हैं।

साष्टांग नमस्कार : यह नमस्कार सिर्फ मंदिर में ही किया जाता है। षड्रिपु, मन और बुद्धि, इन आठों अंगों से ईश्वर की शरण में जाना अर्थात साष्टांग नमन करना ही साष्टांग नमस्कार है।

सामान्य नमस्कार :

1.कभी भी एक हाथ से नमस्कार न करें और न ही गर्दन हिलाकर नमस्कार करें। दोनों हाथों को जोड़कर ही नमस्कार करें। इससे सामने वाले के मन में आपके प्रति अच्छी भावना का विकास होगा और आप में भी। इसे मात्र औपचारिक अभिवादन न समझें।

2.नमस्कार करते समय मात्र 2 सेकंड के लिए नेत्रों को बंद कर देना चाहिए। इससे आंखें और मन रिफ्रेश हो जाएंगे।

3.नमस्कार करते समय हाथों में कोई वस्तु नहीं होनी चाहिए।

पाद नमस्कार :

1. ऐसे किसी व्यक्ति के पैर नहीं छूना चाहिए जिसे आप अच्छी तरह जानते नहीं हों या जो आध्यात्मिक संपन्न व्यक्ति नहीं है। बहुत से लोग आजकल चापलूसी या पद-लालसा के चलते राजनीतिज्ञों के पैर छूते रहते हैं, जो कि गलत है।

साष्टांग नमस्कार : इसे दंडवत प्रणाम भी कहते हैं।

1. मंदिर में नमस्कार करते समय या साष्टांग नमस्कार करते वक्त पैरों में चप्पल या जूते न हों।

2. मंदिर में नमस्कार करते समय पुरुष सिर न ढंकें और स्त्रियों को सिर ढंकना चाहिए। हनुमान मंदिर और कालिका के मंदिर में सभी को सिर ढंकना चाहिए।

3. हाथों को जोड़ते समय अंगुलियां ढीली रखें। अंगुलियों के बीच अंतर न रखें। हाथों की अंगुलियों को अंगूठे से दूर रखें। हथेलियों को एक-दूसरे से न सटाएं, उनके बीच रिक्त स्थान छोड़ें।

4. मंदिर में देवता को नमन करते समय सर्वप्रथम दोनों हथेलियों को छाती के समक्ष एक-दूसरे से जोड़ें। हाथ जोड़ने के उपरांत पीठ को आगे की ओर थोड़ा झुकाएं।

5. फिर सिर को कुछ झुकाकर भ्रूमध्य (भौहों के मध्यभाग) को दोनों हाथों के अंगूठों से स्पर्श कर, मन को देवता के चरणों में एकाग्र करने का प्रयास करें।

6. इसके बाद हाथ सीधे नीचे न लाकर, नम्रतापूर्वक छाती के मध्यभाग को कलाइयों से कुछ क्षण स्पर्श कर, फिर हाथ नीचे लाएं।

नमस्कार के लाभ :

अच्छी भावना और तरीके से किए गए नमस्कार का प्रथम लाभ यह है कि इससे मन में निर्मलता बढ़ती है। निर्मलता से सकारात्मकता का विकास होता है। अच्छे से नमस्कार करने से दूसरे के मन में आपके प्रति अच्छे भावों का विकास होता है।

इस तरह नस्कार का आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों ही तरह का लाभ मिलता है। इससे जहां दूसरों के प्रति मन में नम्रता बढ़ती है वहीं मंदिर में नमस्कार करने से व्यक्ति के भीतर शरणागत और कृतज्ञता के भाव का विकास होता है। इससे मन और मस्तिष्क शांत होता है और शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है।
नमस्कार के मुख्यत: तीन प्रकार हैं:- सामान्य नमस्कार, पद नमस्कार और साष्टांग नमस्कार।
सामान्य नमस्कार : किसी से मिलते वक्त सामान्य तौर पर दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर नमस्कार किया जाता है। प्रतिदिन हमसे कोई न कोई मिलता ही है, जो हमें नमस्कार करता है या हम उसे नमस्कार करते हैं।
पद नमस्कार : इस नमस्कार के अंतर्गत हम अपने परिवार और कुटुम्ब के बुजुर्गों, माता-पिता आदि के पैर छूकर नमस्कार करते हैं। परिवार के अलावा हम अपने गुरु और आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न व्यक्ति के पैर छूते हैं।
साष्टांग नमस्कार : यह नमस्कार सिर्फ मंदिर में ही किया जाता है। षड्रिपु, मन और बुद्धि, इन आठों अंगों से ईश्वर की शरण में जाना अर्थात साष्टांग नमन करना ही साष्टांग नमस्कार है।
सामान्य नमस्कार :
1.कभी भी एक हाथ से नमस्कार न करें और न ही गर्दन हिलाकर नमस्कार करें। दोनों हाथों को जोड़कर ही नमस्कार करें। इससे सामने वाले के मन में आपके प्रति अच्छी भावना का विकास होगा और आप में भी। इसे मात्र औपचारिक अभिवादन न समझें।
2.नमस्कार करते समय मात्र 2 सेकंड के लिए नेत्रों को बंद कर देना चाहिए। इससे आंखें और मन रिफ्रेश हो जाएंगे।
3.नमस्कार करते समय हाथों में कोई वस्तु नहीं होनी चाहिए।
पाद नमस्कार :
1. ऐसे किसी व्यक्ति के पैर नहीं छूना चाहिए जिसे आप अच्छी तरह जानते नहीं हों या जो आध्यात्मिक संपन्न व्यक्ति नहीं है। बहुत से लोग आजकल चापलूसी या पद-लालसा के चलते राजनीतिज्ञों के पैर छूते रहते हैं, जो कि गलत है।
साष्टांग नमस्कार : इसे दंडवत प्रणाम भी कहते हैं।
1. मंदिर में नमस्कार करते समय या साष्टांग नमस्कार करते वक्त पैरों में चप्पल या जूते न हों।
2. मंदिर में नमस्कार करते समय पुरुष सिर न ढंकें और स्त्रियों को सिर ढंकना चाहिए। हनुमान मंदिर और कालिका के मंदिर में सभी को सिर ढंकना चाहिए।
3. हाथों को जोड़ते समय अंगुलियां ढीली रखें। अंगुलियों के बीच अंतर न रखें। हाथों की अंगुलियों को अंगूठे से दूर रखें। हथेलियों को एक-दूसरे से न सटाएं, उनके बीच रिक्त स्थान छोड़ें।
4. मंदिर में देवता को नमन करते समय सर्वप्रथम दोनों हथेलियों को छाती के समक्ष एक-दूसरे से जोड़ें। हाथ जोड़ने के उपरांत पीठ को आगे की ओर थोड़ा झुकाएं।
5. फिर सिर को कुछ झुकाकर भ्रूमध्य (भौहों के मध्यभाग) को दोनों हाथों के अंगूठों से स्पर्श कर, मन को देवता के चरणों में एकाग्र करने का प्रयास करें।
6. इसके बाद हाथ सीधे नीचे न लाकर, नम्रतापूर्वक छाती के मध्यभाग को कलाइयों से कुछ क्षण स्पर्श कर, फिर हाथ नीचे लाएं।
नमस्कार के लाभ :
अच्छी भावना और तरीके से किए गए नमस्कार का प्रथम लाभ यह है कि इससे मन में निर्मलता बढ़ती है। निर्मलता से सकारात्मकता का विकास होता है। अच्छे से नमस्कार करने से दूसरे के मन में आपके प्रति अच्छे भावों का विकास होता है।
इस तरह नस्कार का आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों ही तरह का लाभ मिलता है। इससे जहां दूसरों के प्रति मन में नम्रता बढ़ती है वहीं मंदिर में नमस्कार करने से व्यक्ति के भीतर शरणागत और कृतज्ञता के भाव का विकास होता है। इससे मन और मस्तिष्क शांत होता है और शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है।
नमस्कार के मुख्यत: तीन प्रकार हैं:- सामान्य नमस्कार, पद नमस्कार और साष्टांग नमस्कार।सामान्य नमस्कार : किसी से मिलते वक्त सामान्य तौर पर दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर नमस्कार किया जाता है। प्रतिदिन हमसे कोई न कोई मिलता ही है, जो हमें नमस्कार करता है या हम उसे नमस्कार करते हैं।पद नमस्कार : इस नमस्कार के अंतर्गत हम अपने परिवार और कुटुम्ब के बुजुर्गों, माता-पिता आदि के पैर छूकर नमस्कार करते हैं। परिवार के अलावा हम अपने गुरु और आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न व्यक्ति के पैर छूते हैं।साष्टांग नमस्कार : यह नमस्कार सिर्फ मंदिर में ही किया जाता है। षड्रिपु, मन और बुद्धि, इन आठों अंगों से ईश्वर की शरण में जाना अर्थात साष्टांग नमन करना ही साष्टांग नमस्कार है।सामान्य नमस्कार :1.कभी भी एक हाथ से नमस्कार न करें और न ही गर्दन हिलाकर नमस्कार करें। दोनों हाथों को जोड़कर ही नमस्कार करें। इससे सामने वाले के मन में आपके प्रति अच्छी भावना का विकास होगा और आप में भी। इसे मात्र औपचारिक अभिवादन न समझें।2.नमस्कार करते समय मात्र 2 सेकंड के लिए नेत्रों को बंद कर देना चाहिए। इससे आंखें और मन रिफ्रेश हो जाएंगे।3.नमस्कार करते समय हाथों में कोई वस्तु नहीं होनी चाहिए।पाद नमस्कार :1. ऐसे किसी व्यक्ति के पैर नहीं छूना चाहिए जिसे आप अच्छी तरह जानते नहीं हों या जो आध्यात्मिक संपन्न व्यक्ति नहीं है। बहुत से लोग आजकल चापलूसी या पद-लालसा के चलते राजनीतिज्ञों के पैर छूते रहते हैं, जो कि गलत है।साष्टांग नमस्कार : इसे दंडवत प्रणाम भी कहते हैं।1. मंदिर में नमस्कार करते समय या साष्टांग नमस्कार करते वक्त पैरों में चप्पल या जूते न हों।2. मंदिर में नमस्कार करते समय पुरुष सिर न ढंकें और स्त्रियों को सिर ढंकना चाहिए। हनुमान मंदिर और कालिका के मंदिर में सभी को सिर ढंकना चाहिए।3. हाथों को जोड़ते समय अंगुलियां ढीली रखें। अंगुलियों के बीच अंतर न रखें। हाथों की अंगुलियों को अंगूठे से दूर रखें। हथेलियों को एक-दूसरे से न सटाएं, उनके बीच रिक्त स्थान छोड़ें।4. मंदिर में देवता को नमन करते समय सर्वप्रथम दोनों हथेलियों को छाती के समक्ष एक-दूसरे से जोड़ें। हाथ जोड़ने के उपरांत पीठ को आगे की ओर थोड़ा झुकाएं।5. फिर सिर को कुछ झुकाकर भ्रूमध्य (भौहों के मध्यभाग) को दोनों हाथों के अंगूठों से स्पर्श कर, मन को देवता के चरणों में एकाग्र करने का प्रयास करें।6. इसके बाद हाथ सीधे नीचे न लाकर, नम्रतापूर्वक छाती के मध्यभाग को कलाइयों से कुछ क्षण स्पर्श कर, फिर हाथ नीचे लाएं।नमस्कार के लाभ :अच्छी भावना और तरीके से किए गए नमस्कार का प्रथम लाभ यह है कि इससे मन में निर्मलता बढ़ती है। निर्मलता से सकारात्मकता का विकास होता है। अच्छे से नमस्कार करने से दूसरे के मन में आपके प्रति अच्छे भावों का विकास होता है।इस तरह नस्कार का आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों ही तरह का लाभ मिलता है। इससे जहां दूसरों के प्रति मन में नम्रता बढ़ती है वहीं मंदिर में नमस्कार करने से व्यक्ति के भीतर शरणागत और कृतज्ञता के भाव का विकास होता है। इससे मन और मस्तिष्क शांत होता है और शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है।

Monday, 25 March 2013

अस्पताल या होटल...??


आज किसी काम से एक प्राइवेट अस्पताल गया था. अस्पताल में घुसते ही ऐसा अहसास हुआ की जैसे मै किसी अस्पताल में नहीं बल्कि किसी बेहतरीन होटल में आ गया हूँ. होटल जैसी बनाबट, होटल जैसा दिखाबा, होटल जैसा मेनू और होटल जैसी ही कार्यप्रणाली.

आपको जनरल रूम चाहिए या प्राइवेट, प्राइवेट में AC या Non AC, टीवी वाला या बिना टीवी वाला, गीजर वाला या बिना गीजर वाला, फ्रीज़, अलमारी, सोफा और यहाँ तक की किचन भी आपको प्र
ाइवेट रूम में उपलब्ध हो जायेगा.

इसके बाद बारी आती है इलाज की. इलाज़ इतना महंगा की आम आदमी लोन लेकर भी न चुका सके. ऊपर से ना चाहते हुए भी आपको वार्ड बॉय और नर्स को भरी टिप देनी पड़ेगी. ऐसा न करने पर आपकी जान को भी खतरा हो सकता है.

अब बात करते हैं मर्ज़ की. मर्ज़ चाहें छोटा हो या बड़ा ऑपरेशन की नौबत आना आम बात है. और ऑपरेशन से पहले आपको सारा पैसा एडवांस में जमा करना होगा. उसपर भी कोई गारंटी नहीं क्योंकि आपसे इस सम्बन्ध में एक फॉर्म पहले ही भरवा लिया जाता है. डॉक्टर के बनाये पर्चे पर दवाइयां ऐसी भाषा में लिखी होंगी की जिसे डॉक्टर या कम्पाउण्डर के अलावा और कोई पढ़ नहीं सकता.

बाहर VIP एम्बुलेंस और अन्दर जन्म से लेकर म्रत्यु तक की सभी बेहतरीन सुबिधायें. आप जाएँ तो कहाँ जाएँ. अपनी जान बचाएं या भाड़ में जाएँ. पैसा हो तो अन्दर जाएँ, वर्ना सरकारी अस्पताल जाएँ या शमशान जाएँ.

लोग डॉक्टर को भगवान कहते हैं पर आजकल के भगवान् भी प्रोफेशनल हो गए हैं. एक दिन में 4 ऑपरेशन की क्षमता पर वे 12 करते हैं तभी तो कभी कैंची तो कभी घडी पेट के अन्दर ही भूल जाते हैं. जब आप शिकायत ले कर जाएँ तो वे फिर से ऑपरेशन करते हैं. और फिर से पैसा कमाते हैं.

डॉक्टर का रूप तो एक समाज सेवी का होना चाहिए. पर कभी कभी ये समाजसेवी भी हड़ताल पर जाते हैं. फिर चाहें कोई जिए या मरे इनकी समाजसेवा चलती रहती है. अपने यहाँ बेहतरीन सुविधाएँ देने का दावा करते हैं और अपने बच्चों का इलाज़ विदेश में कराते हैं. कमाल है.

और क्या क्या बताएं....कुछ आप भी अपने अनुभव बताएं....


By : Nishant Gupta 

कॉमेडी या अश्लीलता..??



आजकल टीवी सीरियलों, कार्यक्रमों और फिल्मों में जिस तरह से अपशब्दों और गालियों का प्रयोग हो रहा है, वह एक चिंतनीय विषय है. इनमें सबसे ज्यादा फूहड़पन फैला रहे हैं आजकल के कॉमेडी शो. ये सभी कार्यक्रम महिलाओं और बच्चों की पहली पसंद बने हुये हैं. इन सबसे आने वाली पीढ़ियों में क्या सन्देश जा रहा है, ये हमें सोचना होगा. यही कारण है की आजकल के बच्चे बहुत जल्दी बड़े हो जाते हैं.
आजकल टीवी पर 'साले', 'कमीने', 'फट्टू', 'फक'..... ना जाने ऐसे और कितने ही शब्द जिनको यहाँ पर लिखा भी नहीं जा सकता, का प्रयोग किया जा रहा है. अब तो विज्ञापनों में भी ऐसे शब्दों का प्रयोग हो रहा है. एयरटेल का ऐड 'हर दोस्त कमीना होता है' आपको दिन भर दिखाई पड़ेगा. कामेडी शो की भाषा आप ध्यान से सुन ले तो शर्म से मर ही जाएँ.
ये सब एक साजिश है हमारी संस्कृति को बर्बाद करने की. और इन सब में साथ दे रहा है हमारा सेंसर बोर्ड. जब हमारा सेंसर बोर्ड ही कुछ नहीं कर रहा है तो हम क्या कर सकते हैं. हम सिर्फ इतना कर सकते हैं की अपने बच्चों को कंट्रोल में रखें और उन्हें भारतीय संस्कृति के अनुरूप शिक्षा दें.