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Monday, 25 March 2013

अस्पताल या होटल...??


आज किसी काम से एक प्राइवेट अस्पताल गया था. अस्पताल में घुसते ही ऐसा अहसास हुआ की जैसे मै किसी अस्पताल में नहीं बल्कि किसी बेहतरीन होटल में आ गया हूँ. होटल जैसी बनाबट, होटल जैसा दिखाबा, होटल जैसा मेनू और होटल जैसी ही कार्यप्रणाली.

आपको जनरल रूम चाहिए या प्राइवेट, प्राइवेट में AC या Non AC, टीवी वाला या बिना टीवी वाला, गीजर वाला या बिना गीजर वाला, फ्रीज़, अलमारी, सोफा और यहाँ तक की किचन भी आपको प्र
ाइवेट रूम में उपलब्ध हो जायेगा.

इसके बाद बारी आती है इलाज की. इलाज़ इतना महंगा की आम आदमी लोन लेकर भी न चुका सके. ऊपर से ना चाहते हुए भी आपको वार्ड बॉय और नर्स को भरी टिप देनी पड़ेगी. ऐसा न करने पर आपकी जान को भी खतरा हो सकता है.

अब बात करते हैं मर्ज़ की. मर्ज़ चाहें छोटा हो या बड़ा ऑपरेशन की नौबत आना आम बात है. और ऑपरेशन से पहले आपको सारा पैसा एडवांस में जमा करना होगा. उसपर भी कोई गारंटी नहीं क्योंकि आपसे इस सम्बन्ध में एक फॉर्म पहले ही भरवा लिया जाता है. डॉक्टर के बनाये पर्चे पर दवाइयां ऐसी भाषा में लिखी होंगी की जिसे डॉक्टर या कम्पाउण्डर के अलावा और कोई पढ़ नहीं सकता.

बाहर VIP एम्बुलेंस और अन्दर जन्म से लेकर म्रत्यु तक की सभी बेहतरीन सुबिधायें. आप जाएँ तो कहाँ जाएँ. अपनी जान बचाएं या भाड़ में जाएँ. पैसा हो तो अन्दर जाएँ, वर्ना सरकारी अस्पताल जाएँ या शमशान जाएँ.

लोग डॉक्टर को भगवान कहते हैं पर आजकल के भगवान् भी प्रोफेशनल हो गए हैं. एक दिन में 4 ऑपरेशन की क्षमता पर वे 12 करते हैं तभी तो कभी कैंची तो कभी घडी पेट के अन्दर ही भूल जाते हैं. जब आप शिकायत ले कर जाएँ तो वे फिर से ऑपरेशन करते हैं. और फिर से पैसा कमाते हैं.

डॉक्टर का रूप तो एक समाज सेवी का होना चाहिए. पर कभी कभी ये समाजसेवी भी हड़ताल पर जाते हैं. फिर चाहें कोई जिए या मरे इनकी समाजसेवा चलती रहती है. अपने यहाँ बेहतरीन सुविधाएँ देने का दावा करते हैं और अपने बच्चों का इलाज़ विदेश में कराते हैं. कमाल है.

और क्या क्या बताएं....कुछ आप भी अपने अनुभव बताएं....


By : Nishant Gupta 

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